Monday, March 8, 2010

हमारी सोच

हाथ से पंखा करने के बजाय बिजली की सेवा ले ली.
हाथ से कपडा धोने के बजाय, वाशिंग मशीन खरीद ली.
पैदल चलने की बजाय, मोटर साईकिल, बस, और कार की सवारी कर ली.
कुछ कदम चलकर नाटक, कुश्ती, नाच देखने के बजाय टीवी से दोस्ती कर ली.

जाकर पोस्ट ऑफिस में, पोस्टकार्ड, और टिकट अब कौन लाये
बहाना समय बचत का, इसलिए कंप्यूटर दुनिया की सैर कराए.
भूल गए वो लकड़ी की कलम, बार-बार स्याही में डुबोना
अब बाल-पेन और कंप्यूटर-माउस से सारे काम काज का होना.

घर, गाड़ी, और ऑफिस में वातानुकूलित वातावरण का अहसाश
भूल गए हम पसीना बहाना, और शरीर का कर लिया सत्यानाश.
सोचते हैं हम, बहुत विकसित हो गए हैं दुनिया में अब
लेकिन हमारी सोच ने कूड़ा कर दिया है सब.

लेकिन अब हम आगे बढ़ें हैं या फिर बहुत पीछे चले गएँ है क्या
प्रशन है सोचने का, जीवन और शैली के बदलने का
आओ अपने जीवन को देखें, केवल "विकास" से होगा क्या
अवसर है हमारे पास सार्थक जीवन जीने का.

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