दुर्भाग्य मेरे देश का, जो स्वार्थी नेता पैदा हुए,
अपनी झोली भरने को, देश बाँटने में लगे हुए.
भाषा, प्रान्त, और धर्म को हथियार बना लिया,
विकास और देश-प्रेम को दिन दहाड़े तज दिया.
कैसे इनकी नेतागिरी चमके यही इनकी चिंता है,
एक बड़ा भारतीय वर्ग, आज भी नींद में सोता है.
तभी तो झूठे नेताओं का अभुदय हो रहा है,
गन्दी राजनीति का खुले-आम, प्रदर्शन हो रहा है.
देश कैसे आगे बढेगा, ये विचार अब दिखता नहीं,
"मेरी कुर्सी सुरक्षित रहे," इसके सिवाए कुछ सूझता नहीं.
हे ईश्वर अब सदबुद्धि दो, हमारी आंखे खोल दो,
झूठे नेताओं को समझ सकें, ऐसी हमें सोच दो.
राज
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