चित हो गए चारो खाने, अखाड़े के नामी पहलवान
शेखी बखेरते फिरते थे जो, अपने पूरा हिंदुस्तान
कहते थे, किसकी मजाल जो, अपने को हरा पाए
हम ही, अकेले काफी हैं, कोई न हमें डरा पाए.
बहुत घमण्ड था, ताकत पर, बनते थे, शूरमाधारी
सोचा कि कभी न हारूंगा, चाहे दुनिया आ जाये सारी
सामने वाले पहलवानों को भी, लगता उससे भय था
सोचते रोज़ उसे कैसे, अखाड़े में, धूल चाटना, तय था
मिलकर, एक दिन सबने सोची, हराने की युक्ति उसको
बोले सब इकठठा होकर, आ जाओ, देखते हैं, तुझको,
सबने एक साथ जोर लगाकर, पटक दिया, अखाड़े में,
अजेय पहलवान, धराशायी हुआ, शहर के एक मोहल्ले में.
राज कुमार
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